काँटे

 

“भय्यू तू कब शादी करेगा रे, अब तो तीनों बड़ी बहनो को भी विदा कर दिया। छोटा हो कर भी बड़ा बन गया, अब तो घर बसा ले।” बड़की बुआ बोली।

“अच्छा एक बात समझ नहीं आई बेटा, कि तूने भैया के रहते हुए शादी क्यों नही की? पूरा कुटुम्ब समझा कर थक गया, हार मान ली सबने !पर तू नहीं माना।”

“बुआ आपको तो पता है ना मम्मी को पंद्रह साल तक बच्चे नही हुए।कितने व्रत, पूजा, मन्नत, दवाईया और शंका - कुशंकाओ के साथ उन्होंने जीवन के पंद्रह साल घुट घुट कर बिताए होंगे। और जब संतान भी हुई तो पहली, दूसरी, तीसरी भी बेटी और फिर भी बेटे की चाह ने दम नही तोड़ा और मैं आया।”

“सोचो बुआ, मम्मी पापा ने क्या सुख देखा जीवन का। बच्चों के कारण पापा को मिलेट्री छोड़ना पड़ी और छोटी सी जॉब कर ली। बस फिर चार बच्चों की परवरिश, बेटियों की शादी और उन दोनों की भागती उम्र। बस यही रह गया जीवन।”

“मुझे आज तक याद नहीं की वो दोनों कभी ऐसे ही घूमने गए हो, जाना होता भी था तो परिवार में किसी की शादी या शोक में बस। माँ के जीवन में सालों तक जो काँटे पैरों में चुभते रहे बस उसी एक-एक काँटे को निकालने की कोशिश में लगा हूँ बुआ।”

“मन्नतों से मुझे पाया है, खरा उतरने की छोटी सी कोशिश में लगा हूँ, उनका संसार ज्यादा दिन का नही, मेरा तो अभी बहुत बाकी है!”

“अरे तो तेरी बीबी भी सेवा करेगी; उसमे क्या?”

“नही बुआ माँ ने काँटे मेरे लिए सहे मुझे ही निकालना होगा।”

                                                                                     ****

Comments